परिमार्जन और दाखिल-खारिज में क्या अंतर है? (कौन-सा कब)
दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) तब होता है जब ज़मीन खरीद या विरासत के बाद रिकॉर्ड में नया मालिक चढ़ाना हो। परिमार्जन तब, जब जमाबंदी में पहले से दर्ज जानकारी — नाम की स्पेलिंग, रकबा, खाता-खेसरा या लगान — की गलती सुधारनी हो। यानी दाखिल-खारिज ‘मालिक बदलता’ है, परिमार्जन ‘गलती सुधारता’ है।
WhatsApp पर मदद लेंदाखिल-खारिज क्या करता है
जब ज़मीन बिकती है या विरासत में मिलती है, तो दाखिल-खारिज से पुराने मालिक का नाम हटाकर नए मालिक का नाम जमाबंदी में चढ़ता है — यानी मालिकाना का बदलाव।
परिमार्जन क्या करता है
अगर जमाबंदी में पहले से कोई गलती है — जैसे नाम की स्पेलिंग, रकबा, खाता-खेसरा या लगान — तो परिमार्जन (परिमार्जन प्लस) से उसे सुधारा जाता है। इसमें मालिक नहीं बदलता, सिर्फ़ गलती ठीक होती है।
आपको कौन-सा चाहिए?
मालिक बदलना है (खरीद/विरासत) → दाखिल-खारिज। पहले से दर्ज जानकारी में गलती सुधारनी है → परिमार्जन। कभी-कभी दोनों की ज़रूरत पड़ती है — पहले गलती सुधारें, फिर नाम चढ़ाएँ।
सबूत क्या लगते हैं
दाखिल-खारिज में केवाला/रसीद/मृत्यु प्रमाण-पत्र; परिमार्जन में सही जानकारी का सबूत (खतियान, रसीद, पुराना रिकॉर्ड)। सही सबूत से दोनों जल्दी होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
नाम की स्पेलिंग गलत है — कौन-सा करूँ?+
परिमार्जन। यह दर्ज जानकारी की गलती सुधारता है, मालिक नहीं बदलता।
क्या दोनों एक साथ हो सकते हैं?+
ज़रूरत पड़ने पर — पहले परिमार्जन से गलती सुधारें, फिर दाखिल-खारिज से नाम चढ़ाएँ। हम सही क्रम बताकर दोनों में मदद करते हैं।
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